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जब सवालिया निशान ग़ायब होने लगे

त्रिभुवन का व्यंग्य कहता है कि लोकतंत्र भाषा के मरने से नहीं, व्याकरण के सिकुड़ने से ख़त्म होता है।

त्रिभुवन विराम चिह्नों के बहाने लोकतंत्र की कहानी कहते हैं। उनके यहां सवालिया निशान महज़ व्याकरण नहीं, सवाल पूछने की आज़ादी है। और तानाशाही को पूर्ण विराम पसंद है, जिसके बाद कोई बहस नहीं होती।

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मूल: त्रिभुवन · सम्मुख · 30 सितंबर 2026पढ़ें 1 मिनट · सुनें 2 मिनट