साहित्य
ग़ालिब, जिन्हें हर पीढ़ी नये सिरे से पढ़ती है
पंकज पराशर की किताब 'ग़ालिब के सौ रंग' की भूमिका, जो बताती है कि ग़ालिब किसी एक खांचे में क्यों नहीं समाते।
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ज़रूरी ख़बरों तक जाती एक पगडंडी
ताज़ा · साहित्य
त्रिभुवन का व्यंग्य कहता है कि लोकतंत्र भाषा के मरने से नहीं, व्याकरण के सिकुड़ने से ख़त्म होता है।
त्रिभुवन विराम चिह्नों के बहाने लोकतंत्र की कहानी कहते हैं। उनके यहां सवालिया निशान महज़ व्याकरण नहीं, सवाल पूछने की आज़ादी है। और तानाशाही को पूर्ण विराम पसंद है, जिसके बाद कोई बहस नहीं होती।
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पंकज पराशर की किताब 'ग़ालिब के सौ रंग' की भूमिका, जो बताती है कि ग़ालिब किसी एक खांचे में क्यों नहीं समाते।
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साहित्य
अनिरुद्ध शर्मा का लेख, संगीतकार जोड़ी दिलीप-समीर सेन के फ़िल्मी सफ़र और उसकी सीमाओं पर।
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साहित्य
गगन तलरेजा का व्यंग्य भरा लेख, कि कैसे गांधी परीक्षा की कॉपियों में रटे गये, पर ज़िंदगी में उतरे नहीं।
हिंदवी · पढ़ें 1 मिनट ·