जब सवालिया निशान ग़ायब होने लगे
त्रिभुवन का व्यंग्य कहता है कि लोकतंत्र भाषा के मरने से नहीं, व्याकरण के सिकुड़ने से ख़त्म होता है।
त्रिभुवन विराम चिह्नों के बहाने लोकतंत्र की कहानी कहते हैं। उनके यहां सवालिया निशान महज़ व्याकरण नहीं, सवाल पूछने की आज़ादी है। और तानाशाही को पूर्ण विराम पसंद है, जिसके बाद कोई बहस नहीं होती।
व्यंग्य की सबसे तीखी बात ये है कि सवाल को सेंसर नहीं किया जाता, बस वाक्य की बनावट बदल दी जाती है। क्या हुआ की जगह लिखा जाता है कि ऐसा हुआ, और सवाल चुपचाप ग़ायब हो जाता है।
फिर हर निशान को एक लोकतांत्रिक काम मिलता है। अल्पविराम सांस लेने और असहमति की जगह है, कोष्ठक निजी सोच का कोना, तीन बिंदु अधूरेपन का इक़रार, और फ़ुटनोट वो जगह जहां असुविधाजनक सच बचे रहते हैं। संस्कृत का दंड, उर्दू का उल्टा सवालिया निशान और फ़ारसी के उद्धरण-चिह्न भी इस बिरादरी में शामिल हैं।
आख़िर में लेखक की चेतावनी है कि जब सवाल गुम हो जाते हैं, तो लोग ख़ामोशी को ही आम बात मानने लगते हैं, और ज़ुल्म एक अदृश्य आदत बन जाता है।
ये सार देशकाल का अपना लेखन है। मूल लेख के सारे अधिकार सम्मुख के पास हैं।