स्कूली निबंधों में क़ैद गांधी
गगन तलरेजा का व्यंग्य भरा लेख, कि कैसे गांधी परीक्षा की कॉपियों में रटे गये, पर ज़िंदगी में उतरे नहीं।
हिंदी की परीक्षा हो और गांधी पर निबंध न आये, ऐसा शायद ही कभी हुआ। गगन तलरेजा इसी आदत की पड़ताल करते हैं। उनके मुताबिक़ शिक्षकों को लगता था कि राष्ट्रपिता को छोड़ देना कहीं नाराज़गी न मोल ले ले, और गांधी के सिद्धांत रटने में जितने आसान थे, बरतने में उतने ही मुश्किल।
सत्य, अहिंसा, त्याग और आज़ादी की लड़ाई, ये चार खूंटे हर निबंध की बनावट बन गये। नेहरू या सुभाष पर निबंध कभी-कभार आते थे, गांधी लगभग हर बार।
लेखक दिखाते हैं कि बच्चे बिना समझे वही घिसे-पिटे वाक्य दोहराते रहे। वे एक मज़ेदार नमूना भी गढ़ते हैं, जिसमें सिद्धांतों और मनगढ़ंत क़िस्सों की खिचड़ी पक जाती है, और यही शायद हमारी शिक्षा का सच है।
उनका निष्कर्ष है कि गांधी स्कूल की कॉपियों में शब्दों के क़ैदी बन कर रह गये। उम्मीद यही है कि रटने वाली कोई पीढ़ी कभी उन्हें किताबों से निकाल कर अपनी ज़िंदगी में जगह देगी।
ये सार देशकाल का अपना लेखन है। मूल लेख के सारे अधिकार हिंदवी के पास हैं।