ग़ालिब, जिन्हें हर पीढ़ी नये सिरे से पढ़ती है
पंकज पराशर की किताब 'ग़ालिब के सौ रंग' की भूमिका, जो बताती है कि ग़ालिब किसी एक खांचे में क्यों नहीं समाते।
बड़ा साहित्य वो है जिसे हर पीढ़ी अपनी तरह से दोबारा पढ़ती है। पराशर इसी बात से ग़ालिब तक पहुंचते हैं। उन्नीसवीं सदी के ये शायर इश्क़, मौत, पहचान और ज़िंदगी के मानी जैसे सवालों पर लिखते हैं, जो कभी पुराने नहीं होते।
लेखक ग़ालिब को कई परतों में पढ़ने की बात करते हैं: फ़ारसी और उर्दू की ज़बान की परत, दर्शन की परत जो सवाल उठाती है पर हल नहीं थोपती, उनके बदलते दौर की ऐतिहासिक परत, और इंसान के भीतर की मनोवैज्ञानिक परत।
उनका ज़ोर इस बात पर है कि ग़ालिब को सिर्फ़ सूफ़ी, सिर्फ़ रूमानी या सिर्फ़ दार्शनिक कह देना उन्हें छोटा करना है। उनकी ख़ूबी इन सबको बेहद कसी हुई ज़बान में एक साथ पिरो देने में है।
भूमिका का निष्कर्ष है कि ग़ालिब को पढ़ना एक पूरा हो जाने वाला काम नहीं, एक चलता रहने वाला अभ्यास है, जो शायर से ज़्यादा पढ़ने वाले को बदलता है।
ये सार देशकाल का अपना लेखन है। मूल लेख के सारे अधिकार सम्मुख के पास हैं।