सूडान में अमेरिकी दबाव का दांव उल्टा पड़ा
एक जानकार का तर्क है कि सिर्फ़ एक पक्ष पर पाबंदियां लगा कर जंग नहीं रुकती, और अमेरिका ने ख़ुद को ही अलग-थलग कर लिया।
सूडान की जंग को तीन साल से ज़्यादा हो गये। संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान अमेरिका ने दबाव का बड़ा दांव खेला: सेना प्रमुख जनरल अल-बुरहान बिना शर्त युद्धविराम पर दस्तख़त करें, तभी उन्हें वहां बोलने दिया जाएगा।
हडसन के मुताबिक़ ये ग़लत समझ पर टिका था। लड़ने वाले जीत की उम्मीद में नहीं, अपने वजूद के लिए लड़ रहे हैं, और ऐसे में सिर्फ़ कूटनीतिक दबाव जंग का नतीजा नहीं बदलता।
दूसरी ग़लती एकतरफ़ापन है। पाबंदियां सिर्फ़ सेना पर लगीं, जबकि अर्धसैनिक रैपिड सपोर्ट फ़ोर्सेज़ को ज़्यादा सहयोगी मान लिया गया, जिनकी अमन की बातों पर लेखक को भरोसा नहीं। दोनों पक्षों को नाजायज़ बताने से सऊदी अरब जैसे साथी भी नाराज़ हुए।
लेखक याद दिलाते हैं कि बीस साल की अमेरिकी पाबंदियां पहले भी सूडान की सत्ता को झुका नहीं पायी थीं। अमन चाहिए तो दोनों लड़ने वालों से बात करनी होगी, सत्ता बदलने वाले दबाव से नहीं।
ये सार देशकाल का अपना लेखन है। मूल लेख के सारे अधिकार Al Jazeera के पास हैं।