बोत्सवाना के साठ साल: हीरे की चमक और उसके बाद का सवाल
अफ़्रीका की नाकामी वाली कहानी को चुनौती देता एक देश, जिसने खदानों की दौलत लोगों तक पहुंचायी, पर अब उसे हीरों के बाद की राह खोजनी है।
1966 में आज़ादी के वक़्त बोत्सवाना दुनिया के सबसे ग़रीब देशों में था। साठ साल बाद वो ऊपरी-मध्य आय वाला देश है। 1965 से 1980 के बीच उसकी अर्थव्यवस्था औसतन 13.9 फ़ीसदी सालाना बढ़ी, और आज उसकी प्रति व्यक्ति आय दक्षिण अफ़्रीका से भी ज़्यादा है।
म्हाका के मुताबिक़ राज़ हीरों में नहीं, उनके इंतज़ाम में है। सरकार ने हीरा खनन में आधी हिस्सेदारी अपने पास रखी और कमाई का हिस्सा भविष्य के कोष में डाला। इसी से वो उस हालत से बचा, जिसमें खदानों की दौलत चंद हाथों में सिमट जाती है।
नतीजे समाज में भी दिखते हैं। ग़रीबी 2002-03 के 30.6 फ़ीसदी से घट कर 2022 में 14.5 फ़ीसदी रह गयी। HIV से जूझती 98 फ़ीसदी गर्भवती महिलाओं को इलाज मिलता है, और मां से बच्चे में संक्रमण रोकने में देश ने मिसाल क़ायम की है।
पर ख़तरा भी साफ़ है। सामान के निर्यात का लगभग 90 फ़ीसदी हीरे हैं। लैब में बने हीरों और गिरती मांग से अर्थव्यवस्था 2024 और 2025 में सिकुड़ी। बेरोज़गारी 21 फ़ीसदी है, नौजवानों में लगभग 29 फ़ीसदी। अब देश को हीरों के बाद की अर्थव्यवस्था गढ़नी है।
ये सार देशकाल का अपना लेखन है। मूल लेख के सारे अधिकार Al Jazeera के पास हैं।