नाकाम मौत की सज़ा और दोहरे पैमाने
अमेरिका में एक महिला को ज़हरीले इंजेक्शन से मौत देने की कोशिश नाकाम हुई। लेखिका पूछती हैं कि अगर यही ईरान में होता, तो दुनिया क्या कहती?
3 अक्टूबर को अमेरिका के टेनेसी में 50 साल की क्रिस्टा पाइक को मौत की सज़ा दी जानी थी। 1820 के बाद राज्य में ये सज़ा पाने वाली वो पहली औरत होतीं। ज़हरीला इंजेक्शन देने की प्रक्रिया नाकाम रही, और उन्हें ज़िंदा अस्पताल ले जाया गया।
पाइक को 18 साल की उम्र में एक साथी छात्रा की हत्या का दोषी ठहराया गया था। बचपन से उन्होंने यौन हिंसा झेली और मानसिक बीमारी से जूझती रहीं। इंजेक्शन के दर्द से डर कर उन्होंने गोली से मौत मांगी थी, जो नामंज़ूर हुई।
फ़र्नांडेज़ का तीखा सवाल है: अगर ईरान ऐसी ही किसी टूटी हुई औरत की सज़ा में ऐसी चूक करता, तो निंदा की अगुवाई अमेरिका करता। यहां वैसा कोई शोर नहीं हुआ।
वे आंकड़े भी रखती हैं। 1973 से अब तक 200 से ज़्यादा लोग मौत की सज़ा पाने के बाद बेगुनाह साबित हुए हैं। अमेरिका की आबादी में अश्वेत 12 फ़ीसदी हैं, पर मौत की सज़ा पाये क़ैदियों में 40 फ़ीसदी। उनके लिए ये सज़ा इंसाफ़ कम, ताक़तवरों का हथियार ज़्यादा है।
ये सार देशकाल का अपना लेखन है। मूल लेख के सारे अधिकार Al Jazeera के पास हैं।