हिमालय की चेतावनी: बदलो, वरना मिटो
नेपाल की भयानक बाढ़ के बाद सुनीता नारायण पूछती हैं कि पहाड़ों पर बार-बार टूटती आफ़त से हम कब सीखेंगे।
26 अगस्त को नेपाल में आयी बाढ़ में 1,300 से ज़्यादा लोगों की जान गयी। लांगटांग लिरुंग चोटी के पास बर्फ़ और चट्टान का क़रीब 14.2 करोड़ घन मीटर का हिस्सा टूटा। इसने नदियों में क़ुदरती बांध बना दिये, और जब वे टूटे, तो नीचे बसे इलाक़े बह गये।
नारायण इसे अकेली घटना नहीं मानतीं। 2021 में चमोली, 2024 में सिक्किम, 2025 में हिमाचल, हर बार कहानी मिलती-जुलती है।
वे दो वजहें गिनाती हैं। पहली, बढ़ती गर्मी, जो ग्लेशियरों को अस्थिर कर रही है और ढलानों को कमज़ोर। दूसरी, बिना सोचे-समझे विकास: पनबिजली बांध और सुरंगें, जिनमें ढलानों की हिफ़ाज़त का कोई इंतज़ाम नहीं।
उनका कहना है कि दुनिया 1.5 डिग्री की हद पार कर चुकी है, और इसके आगे हर आफ़त पहले से बड़ी होगी। छोटे-मोटे सुधार से काम नहीं चलेगा, ये सोच बदलनी होगी कि क़ुदरत को क़ाबू किया जा सकता है।
ये सार देशकाल का अपना लेखन है। मूल लेख के सारे अधिकार Down To Earth के पास हैं।