क़र्ज़ का जाल और आज़ादी की क़ीमत
सेनेगल की अर्थशास्त्री यासीन फ़ॉल कहती हैं कि IMF का नया पैकेज वही पुरानी दवा है, जो चालीस बरस से मर्ज़ बढ़ा रही है।
जुलाई 2024 में सेनेगल को पता चला कि सरकार के बही-खाते में देश की GDP के लगभग एक चौथाई के बराबर क़र्ज़ छिपा हुआ था। 2023 के आख़िर में जो क़र्ज़ 74 फ़ीसदी बताया गया था, वो असल में 99 फ़ीसदी निकला। अब कुल सरकारी क़र्ज़ GDP के 130 फ़ीसदी से ऊपर है।
इसी ग़ुस्से में नवंबर 2024 में जनता ने पास्तेफ़ पार्टी को बदलाव और संप्रभुता के वादे पर जिताया। अब IMF ने 2.2 अरब डॉलर का क़र्ज़ कार्यक्रम घोषित किया है।
फ़ॉल का तर्क है कि अफ़्रीका में IMF के कार्यक्रमों ने ठहराव और ग़रीबी ही दी है। निजीकरण, सरकारी ख़र्च में कटौती और बाज़ार को खुली छूट के नुस्ख़ों ने ज़ाम्बिया और इथियोपिया जैसे देशों का क़र्ज़ संकट और गहरा किया।
उनका सुझाव है कि जनता ख़ुद क़र्ज़ का ऑडिट करे और देखे कि कौन सा क़र्ज़ जायज़ था। टैक्स का बोझ आम लोगों पर नहीं, खनन-तेल कंपनियों और अमीरों पर डाला जाए। हर नये क़र्ज़ के लिए संसद की मंज़ूरी ज़रूरी हो, और तेल-गैस की कमाई का हिसाब खुला रहे।
बड़े स्तर पर वे क़र्ज़दार अफ़्रीकी देशों का साझा मोर्चा, क़र्ज़ चुकाने पर 20 से 30 साल की मोहलत, और पुरानी औपनिवेशिक मुद्रा CFA फ़्रैंक से आज़ादी की बात करती हैं। उनके लिए असली सवाल ये है कि सेनेगल पुरानी नीति का बेहतर संस्करण चाहता है या उससे छुटकारा।
ये सार देशकाल का अपना लेखन है। मूल लेख के सारे अधिकार Al Jazeera के पास हैं।