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संस्कृति

किताबों पर क़ब्ज़ा: फ़िलिस्तीनी बच्चों से उनका इतिहास छीनने की कोशिश

पूर्वी यरूशलम में इसराइल की मंज़ूर की हुई किताबें पढ़ने वाले फ़िलिस्तीनी छात्रों की तादाद एक साल में दोगुनी हो गयी है।

मूल: एहाब जबारीन, Al Jazeera, 30 सितंबर 2026
कोलाज: देशकाल

क़ब्ज़े वाले पूर्वी यरूशलम में अब 45,000 फ़िलिस्तीनी छात्र इसराइल की मंज़ूरी वाला पाठ्यक्रम पढ़ रहे हैं, पिछले साल से दोगुने। जबारीन लिखते हैं कि अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून क़ब्ज़ा करने वाली ताक़त को शिक्षा व्यवस्था बदलने या नया पाठ्यक्रम थोपने की इजाज़त नहीं देता।

इसराइल का तर्क है कि फ़िलिस्तीनी किताबें नफ़रत सिखाती हैं। लेखक बताते हैं कि अमेरिकी विदेश विभाग के पैसे से हुए एक अध्ययन समेत कई शोध इस दावे को नहीं मानते।

तो किताबों से हटाया क्या जा रहा है? शोध के मुताबिक़ झंडे, राष्ट्रगान, संप्रभुता और क़ब्ज़े की हक़ीक़त के ज़िक्र। एक अध्ययन में कुछ जगह फ़िलिस्तीन की जगह इसराइल लिख दिया गया। नक़बा और शरणार्थियों की वापसी के हक़ जैसे विचार भी निशाने पर हैं।

जबारीन का निष्कर्ष है कि ये लड़ाई नफ़रत की नहीं, राष्ट्रीय चेतना की है। जिसके हाथ में संस्थाएं हैं, वही तय कर रहा है कि बच्चे अपना इतिहास किस शक्ल में जानें।

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ये सार देशकाल का अपना लेखन है। मूल लेख के सारे अधिकार Al Jazeera के पास हैं।