जिस अदालत को उत्पीड़न दिखाई नहीं दिया
पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज पूछते हैं: क्या दफ़्तर में उत्पीड़न तभी उत्पीड़न है जब उसमें यौन इच्छा हो?
पाकिस्तान की नयी संघीय संवैधानिक अदालत ने हाल में इस्लामाबाद हाई कोर्ट का एक फ़ैसला पलट दिया। अदालत ने कहा कि 2010 के कार्यस्थल उत्पीड़न क़ानून के तहत सिर्फ़ वही बर्ताव उत्पीड़न माना जाएगा जो यौन प्रकृति का हो।
जस्टिस शाह इस सोच को सिरे से ग़लत मानते हैं। उनके मुताबिक़ ये क़ानून इंसान की गरिमा के हक़ से निकला है। जिस मामले की बात है, उसमें अश्लील स्केच बनाने और भद्दी टिप्पणियों जैसी बातें साबित हो चुकी थीं, फिर भी अदालत ने सबूतों पर बात किये बिना मामला ख़ारिज कर दिया।
वे दुनिया की नज़ीरें गिनाते हैं: अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का एक अहम फ़ैसला, कनाडा और भारत की अदालतें, और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की संधि 190। सबका निचोड़ एक है। उत्पीड़न के पीछे इच्छा होना ज़रूरी नहीं, किसी को उसके जेंडर की वजह से नीचा दिखाना भी उत्पीड़न है। ख़ुद पाकिस्तान का 2022 का संशोधन ऐसे भेदभाव को शामिल करता है, चाहे वो यौन हो या न हो।
लेख अदालत के तौर-तरीक़े पर भी सवाल उठाता है। पुरानी नज़ीरें नज़रअंदाज़ की गयीं, अटॉर्नी जनरल को नहीं सुना गया, कोई न्याय-मित्र नियुक्त नहीं हुआ। बेंच पर एक भी महिला जज नहीं थी। और ये अदालत ख़ुद एक विवादित संविधान संशोधन से बनी है, जिससे देश में दो सर्वोच्च अदालतें हो गयी हैं।
जस्टिस शाह का निष्कर्ष है कि किसी संवैधानिक अदालत की असली परख उसकी ताक़त से नहीं, उन हक़ों से होती है जिनकी वो हिफ़ाज़त करती है।
ये सार देशकाल का अपना लेखन है। मूल लेख के सारे अधिकार Dawn के पास हैं।