धांधली का आरोप, फिर भी मैदान में क्यों है विपक्ष?
चुनाव बहिष्कार की आवाज़ों के बीच विपक्षी दलों का कहना है कि मैदान छोड़ना हार को और पक्का कर देगा।
अगर विपक्ष मानता है कि चुनाव में धांधली हो रही है, तो वो चुनाव लड़ क्यों रहा है? ये सवाल 25 सितंबर के बाद तेज़ हुआ, जब एक्टिविस्ट अभिजीत दिपके ने खुल कर चुनाव के बहिष्कार की अपील की।
बहिष्कार के पक्ष की दलील सीधी है। ऐसे चुनाव में शामिल होना उसे जायज़ होने का ठप्पा देना है। और अगर विपक्ष बाहर निकले, तो सड़क पर एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो सकता है।
विपक्षी नेता इससे सहमत नहीं। कांग्रेस के अमिताभ दुबे बांग्लादेश की मिसाल देते हैं, जहां बहिष्कार का नतीजा ये हुआ कि सत्ताधारी दल को इतना बड़ा बहुमत मिल गया कि वो संविधान तक बदल सके। तृणमूल के डेरेक ओ'ब्रायन के लिए बहिष्कार का मतलब है अपनी ज़मीन दूसरे को सौंप देना, और उन कार्यकर्ताओं से दग़ा करना जो बरसों से पार्टी के लिए खप रहे हैं।
लेख व्यावहारिक मुश्किलें भी गिनाता है। चुनाव न लड़ने पर चंदा सूख जाता है, संगठन बिखरने लगता है, और ख़ाली जगह पर सत्ता की मर्ज़ी से चलने वाले नये संगठन उग आते हैं।
इसलिए फ़िलहाल विपक्ष की रणनीति दोहरी है: चुनाव भी लड़ो, और निष्पक्ष चुनाव की लड़ाई भी जारी रखो।
ये सार देशकाल का अपना लेखन है। मूल लेख के सारे अधिकार Scroll के पास हैं।