एक ही मांग, दो शहर: दिल्ली में नाकेबंदी, मुंबई में मेला
मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफ़े की मांग पर गांधी जयंती के दिन हुए प्रदर्शनों ने दिखाया कि पुलिस का रवैया ही विरोध की शक्ल तय कर देता है।
2 अक्टूबर को दिल्ली और मुंबई में लोग एक ही मांग लेकर सड़क पर उतरे: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफ़ा दें। नाराज़गी की जड़ मतदाता सूची की वो सफ़ाई है जिसे SIR कहा जा रहा है। आलोचकों का आरोप है कि इसकी आड़ में लाखों जायज़ मतदाताओं के नाम सूची से ग़ायब हो गये।
Scroll की इस ज़मीनी रिपोर्ट में एक बात चौंकाती है। सवाल सिर्फ़ बाहर से नहीं उठ रहे। आयोग के भीतर ही दो चुनाव आयुक्तों ने दस महीनों में चौदह बार SIR से जुड़े फ़ैसलों पर लिखित असहमति दर्ज करायी है।
फिर रिपोर्ट दोनों शहरों को आमने-सामने रखती है। दिल्ली में पुलिस ने सड़कें रोक दीं, बारह मेट्रो स्टेशन बंद कर दिये, इंटरनेट पर पाबंदी लगी और क़रीब सात सौ लोग हिरासत में लिये गये। कई आयोजक प्रदर्शन की जगह तक पहुंचने से पहले ही पकड़ लिये गये। नतीजा, भीड़ छोटी रह गयी।
मुंबई में इजाज़त नहीं मिली थी, फिर भी दस हज़ार से ज़्यादा लोग जुटे। भाषण हुए, गाने गाये गये, और माहौल किसी मेले जैसा रहा। टकराव की जगह जश्न था।
रिपोर्टरों ने जिनसे बात की, उनकी आवाज़ों में फ़र्क़ साफ़ है। दिल्ली के एक छात्र ने कम हाज़िरी का दोष विपक्षी दलों की ग़ैरहाज़िरी पर डाला। मुंबई के एक टैक्सी ड्राइवर को पूरा तंत्र ही सड़ा हुआ लगता है। और कुछ नौजवानों ने इसे छोटी चिंगारियां कहा, जिनका जलते रहना ज़रूरी है।
ये सार देशकाल का अपना लेखन है। मूल लेख के सारे अधिकार Scroll के पास हैं।